Monday, 10 February 2014

अपरिचित कौन


सुप्त तारों को अकस्मात झंकृत सा कर गया
सुषुप्त से हृदय में मधुर गुंजना सी कर गया
गूंजती है जीवन के लय में एक मधुर झंकार सी
खो स्वयं को भी मिली एक मधुर प्यारी पीर सी
पाकर जिसे सम्मुख मुखर सा हो जाता है मौन
हृदय की मधुर अनुभूतियों में तुम अपरिचित कौन

वसंत से छाए हो तुम घनसार सुरभित जीवन हुआ
अनगिनत नव पुष्प खिलते मन मेरा उपवन हुआ
झूम गर्वित मेघ सम आए परितृप्त जीवन हो गया
मेघमय अनुराग से अभिसिंचित सा ये मन हो गया
नयन के सूने निलय में स्वप्न का चितेरा है कौन
हृदय की मधुर अनुभूतियों में तुम अपरिचित कौन      

कौन बोझिल से मन में बन मधुर मुस्कान रहता
कौन प्यासे नयन में बन कभी बादल सा झरता
प्राप्त क्या हो सका मुझे पीड़ा के अनोखे से क्रय में
चिर तृप्त सा जीवन हुआ अकस्मात् ही एक क्षण में
अनजान से कुछ बन्धनों में बंदी सा कर गया ये कौन
मेरे हृदय की मधुर अनुभूतियों में तुम अपरिचित कौन.........

©प्रियंका

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