Wednesday, 21 May 2014

सागर-----
तुम विशाल, निर्बंध, शान्त, गम्भीर
सदैव तुम्हारी सीमाहीन सत्ता में
अपनी लघुधारा अर्पण की है
परन्तु तुम्हारे निर्दय थपेडों से
हर बार आहत ही हुई हूं

कैसा ये हठ है जो हार नहीं मानता
एक नया संकल्प लिए
हर बार निकल पडता है
अंजुरी में मधुर संगीत और समर्पण लिए

तुम्हारा वैराट्य गम्भीरता शान्ति
छल जाती है हर बार

कभी शबरी की श्रद्धा
कभी सुजाता की पूजा बन
विसर्जित होना चाहती हूं
परन्तु अंजुरी का सम्पूर्ण प्रसाद
आहत और चूर चूर हो जाता है
 बेपरवाह लहरों से टकराकर

समझ ही नहीं पाती
अपने व्यक्तित्व की सम्पूर्ण मिठास
तुम्हें अर्पण कर के भी
क्यों दूर नहीं कर पाती तुम्हारा खारापन
क्यों नहीं बना पाती मीठी
तुम्हारी एक भी बूंद..................
                    -------प्रियंका



Thursday, 8 May 2014

सुन्दर दूरी साथ रहे

अभीप्सित नहीं स्नेह इतना
कि ताजमहल में कम्पन हो
साथ चलें हर पग पर हम
फिर भी सुन्दर दूरी साथ रहे


सुघर पारखी बन कर तुमने
ये जीवन कंचन कर डाला
सम्पूर्ण बने न जीवन मेरा
पारस की सदा ही आस रहे


नियति साथ चलती है सबके
भाग्य रचाए खेल अनेक
बाद दिवस की कड़ी धूप के
बस स्वप्निल संध्या साथ रहे

तुम मन मानस के देव बने
बस इतना सा वर दे देना
पूरी न हो आस सभी
अधूरी ही मन चाही साध रहे
                 ------
प्रियंका 

Friday, 2 May 2014

एक दिन सुबह तो होगी ही

ढलती सांझ हल्का धुंधलका
शून्य का ओर छोर
अशेष प्रश्न उत्तर मौन
धीरे धीरे बीतता एक और दिन
अस्त होने को अकुलाता
हथेली पर रखा सूरज

कहां सूख जाती है
अपने हिस्से की हवा और पानी
सपने एक मुट्ठी सुख लेकर
सहलाते हैं भविष्य का माथा
पर चकनाचूर हो जाते हैं
सच्चाई के पत्थरों से टकराकर
मंजिल तक कहां ले जा पाती है
छिछले पानी की नाव

सूरज अस्त तो होगा ही
पर फिर उगेगा
दिखता है किरणों का
सतरंगी जाल धुंध के पार

उदय होगा अवसाद की
तलहटी से शिशु सूर्य
झिलमिल रोशनी से छंटेगी धुंध
आज सांझ छुपा ले सूरज
 रात तो ढलनी ही है
रात कितनी भी लम्बी हो
पर एक दिन सुबह तो होगी ही
है ना.....................
             -----प्रियंका



Thursday, 24 April 2014

घन मेघ सांवरे

घन मेघ सांवरे उड कर तुम
बाबा की नगरी भी जाना
संग अपने तुम थोडा सा
इन आंखों का पानी भी ले जाना

पापा से कहना स्वस्थ रहें
भइया का मार्ग सदा प्रशस्त रहे
भाभी का सौभाग्य अक्षत रहे
मुन्ने को आशीर्वचन तुम दे आना

मत कहना उनसे दर्द कोई
 कहना मै तो रानी सी हुई
बस मेरी सारी खुशियों की
अच्छे से खबर तुम दे आना

बागों के उन झूलों की
बचपन के खेल खिलौनों की
उन बिछडी सारी सखियों की
खोज खबर तुम ले आना

माटी की सोंधी खुशबू लाना
मां पापा का सारा प्यार दुलार
कुछ बचपन की यादें लाना
आते आते फिर एक बार
भइया की कलाई भी छूकर आना

घन मेघ सांवरे उड कर तुम
बाबा की नगरी भी जाना
संग अपने तुम थोडा सा
इन आंखों का पानी भी ले जाना..........प्रियंका