Sunday, 1 March 2015

ए ज़िंदगी शायद मेरी तुझको जरूरत न रही
तेरी क्या खुद की भी अब मुझे चाहत न रही
जज़्ब हो गया कुछ इस तरह तेरा वज़ूद मुझमे
इस आइने में मेरी अब तो वो सूरत न रही
मायूस अंधेरों में रूह फिरती है अब तो मेरी
ख्यालों में कभी तू ही था और की सूरत न रही
इन खामोशियों ने कुछ इस तरह घेरा मुझको
तुझसे क्या अब खुद से भी कोई गुफ्तगू न रही
अपनी तन्हाइयों से ही इश्क़ हो चला हमको
तेरे ख्याल के सिवा अब कोई जुस्तजू न रही
बहुत थक गई हूँ लड़ के बेरुखी से तेरी
किसी भी सवाल को ज़वाब की आरज़ू न रही
क्यों खोजूं तुझे सारे जहाँ की गलियों में
हमसाया तू है हर वक़्त मै ही रूबरू न रही
______________ प्रियंका पांडे
फिसल ही जाता है वक़्त
बंद मुट्ठी से भी रेत की तरह
छूट जाती है तमाम ज़िद्दी यादें
बीच उँगलियों के
मानो जोड़ लिया हो एक रिश्ता मुझसे
कल की खुशियों और आज के दर्द तक का
सागर सी ज़िन्दगी
कभी अलमस्त कभी शांत
निभा लेती है रिश्ते जाने कैसे कैसे
कभी रेत के घरोंदों जैसे
बनते ढहते सपने
कभी जाने क्या क्या खुद में समेटे
या दफ़न किये बहुत कुछ खुद में
रेत के किनारों जैसे
या
आँख में रेत से चुभते किसी रिश्ते जैसे
जिनकी आज ज़रूरत। ही न रही .......
------प्रियंका े

वादे

चलते चलते ठहरा था
बादल कोई कभी यूँ ही
कर गया नर्म ज़मी
सूखी सी पड़ी थी जो अब तक
ठहरना फितरत न सही
बंध के रहना यूँ मुमकिन भी न था
रूठे मौसम सा जाऊँगा
पर लौट के फिर आ जाऊँगा
देख लेना तू
कह देता था ज़मी से अक्सर
बदले मौसम,हवाएँ और
जीने के तरीके भी शायद
सिमट चुकी है नमी भी
पलकों की कोरों में
बंदिशों में जकड़ी आवाज़ें भी
घुट के रह जाती है कहीं
खुद ही खुद से भी
कह पाती कुछ भी
हाँ....
यकीन है तो इतना बस
कुछ वादे आज भी
कहीं कभी पूरे हुआ करते है..........
------प्रियंका

दौर

जैसे आये थे चुपचाप किसी मोड़ पर मुड़ जायेंगे
बुरे दौर हैं आये थे कुछ ठहरेंगे फिर गुज़र जायेंगे
गुज़रते रहना ही तो फितरत है वक्ते दरिया की
आज बिगड़े हैं पल ख़ुद ही कल सवंर जायेंगे
बंधे हों जंजीरों में तो कैसे वो अपने सच्चे रिश्ते
ग़र अपने हुए तो बताओ भला और किधर जायेंगे
लेके आयी है कुछ किरणें झिलमिल रौशनी संग में
बहुत मुमकिन है उजाले कुछ देर और ठहर जायेंगे
बहुत उम्मीद से आये है आज कुछ मांगने दर पर तेरे
होकेर मायूस बता दे अब किस और शहर जायेंगे
-----प्रियंका

खामोशियाँ.

साँझ ढले परछाइयों की मानिंद
उम्मीद के दरख्तों से
मायूस सी उतर आती है

तलाशती हैं
अंधेरों में गुम होते वज़ूद अपने

ख्वाहिशें खुद ही खुद से
कर लिया करती हैं सारी बाते

टकराकर लौट आती हैं
वापस नाउम्मीद
उनकी आवाज़ें जाने कितनी
बेज़ुबान तो नहीं
पर अहसास ही गुम हैं शायद
बड़ी ज़िद्दी सी होती हैं
कुछ खामोशियाँ.............!!
----प्रियंका ै