Sunday, 1 March 2015

रिश्ते

समेट लेते हैं 
खामोशियों से चंद अल्फ़ाज़
खुशबुएँ अहसासों की
आँखों का सच और 
सादादिली बातों की
कुछ वादे अनकहे
और
यकीन अपने होने का
मुँह चिढ़ाते दूरियों
और हाथों की चंद लकीरों को
ये रिश्ते भी.......
कब अल्फ़ाज़ों के
मुहताज़ हुआ करते हैं!!
-----प्रियंका

विदा तुम्हें हे विगत वर्ष

विगत वर्ष सहेज चला
दुःख बेचैनी सारी उलझन
अंजुरी भर नव उल्लास दिए
सुख की पुलकन मन की छलकन
है ज्ञात किसे वो गया कहाँ
चलता जाता या है ठहरा
है नियति यही है लेख यही
इक बंजारा यायावर जो ठहरा
स्मृतियाँ कितनी ही मधुरिम
जाने कितने पल छिन स्वर्णिम
जीवन पृष्ठों पर अंकित कर
कुछ अश्रुबिंदु कुछ स्मित मर्मर
आगत के स्वागत में तत्पर
स्मरण रहोगे तुम सत्वर
जीवन सुखमय हो बढे हर्ष
है विदा तुम्हें हे विगत वर्ष
----प्रियंका

सूना हर क्षड तेरी सुधियों बिन

मनभावन मोहक मधुरिम सी
हंसती खिलती मन में बसती
पुलकित जीवन प्रमुदित पल छिन
सूना हर क्षड तेरी सुधियों बिन
अरुणोदय की किरणों सी स्मित
सपनों के तारो से ज्यों अंकित
कभी मधुर मधुर हो कभी विकल
नित नव अनुभुति से विह्वल
रचतीं नींदें सजते से दिन
सुना हर क्षड़ तेरी सुधियों बिन
स्मृतियों की लहरों में बहकर
आ जाते मोती दृग पुलिनों पर
हो नेह पुष्प से सुरभित मन
आशा से प्रमुदित उर उपवन
इक आस धरे कट जाते दिन
सूना हर क्षड़ तेरी सुधियों बिन
-----प्रियंका पांडे

ख्वाहिशें..................... बेमानी सी

जिद कोई चांद तोडने की
या छूने की आसमान
कभी लकीरों को मुंह चिढाती
तकदीर से लडने चलती
कभी खामोश कभी मायूस
कभी खुशियों से लबरेज
भूल जाया करती हैं
झूठे हौसलों में खुद को
कुछहौसले उडना भूल जाते हैं
कुछ को उडने की इजाजत ही नहीं
बडी मासूम और नादान हुआ करती हैं
कुछ ख्वाहिशें.....................
बेमानी सी...........
-----प्रियंका
मन छूना चाहता है आकाश
भरता है उड़ान
बाधाए काल गति की
कब रोक पायी हैं
रफ़्तार हौसलों की
पंखों तुमको इज़ाज़त नहीं
रुकने की
तय करना है
अंतहीन सफ़र
पानी हैं मंजिलें
और मुझे भरोसा है
पंखों से ज्यादा
खुद पर...........
----प्रियंका