Sunday, 1 March 2015

टूट कर बिखर गए हैं कुछ पीले पत्ते तुम्हारी यादों के
बहुत कोशिश की सहेज कर रख लूं उन्हें पर...........
वक्त की तेज हवा उन्हें ले ही गई दूर मुझसे
धीरे धीरे निगाहों से ओझल होते देखती रही बस
तुम ही तो कहते थे.....
दुनिया में हमेशा के लिए कुछ भी नहीं रहता........
मालूम है मुझको भी....
पर मेरे जीवन का ये पेड आज भी इंतजार में है
तुम्हारी यादों की नई कोंपलों की
ठूंठ खडा सोचता है कि तुम्हारे आने की नई बहारों के साथ
खिलेंगे कुछ उजले फूल इन पर भी कभी.
बीत जाएगा उदासी से भरा ये पतझड़ भी
मुझे बस यकीन है तुम्हारी बातों पर...........
दुनिया में हमेशा के लिए कुछ भी नहीं रहता.................
--------------प्रियंका
साथ चल ना पाओ तो बस इक पैगाम दे देना
हमारे तनहा जीने का कोई सामान दे देना
वफाये रास ना आये नहीं मायूस तुम होना
कोई बस एक अच्छा सा मुझे इलज़ाम दे देना
तिजारत करती है दुनिया नहीं हर चीज़ बिकती है
मेरे सारे अश्कों का हो सके तुम दाम दे देना
गयी है साथ ही तेरे हंसी भी मेरे होंठो की
कभी जो गर मिले तुमको मेरा पैगाम दे देना
बहुत छोटी सी खुशियाँ हैं नहीं है आरज़ू ज्यादा
कभी जो सिर्फ मेरी थी वही बस शाम दे देना
बहुत है सादा दिल मेरा नहीं है जानता धोखे
लम्हे साथ जो गुज़रे मुहब्बत नाम दे देना
कभी जो लौट पाओ तो गुज़ारिश है चले आना
वफाओं का मेरी हमदम बस अंजाम दे देना
-----प्रियंका.

Thursday, 13 November 2014

तुम ही थे


तुम ही थे

कुछ बंद किताबों के पन्ने
फिर फिर से जैसे खुल जाए
आखर आखर बन सरगम ज्यो
प्राणों में आकर घुल जाए
नयनो की मोहक चितवन में
कोई और नहीं तुम ही थे

महकी महकी सी साँसों में
तेरी मोहक खुशबू बस जाए
हरपल पलछिन रात और दिन
यादे तेरी सज सज जाएँ
सपनो के खिलते गुलशन में
कोई और नहीं तुम ही थे

श्वाँस श्वाँस मधुरिम स्पंदन ले
मन चातक कुछ भी न कह पाए
नयनो की मधुरिम भाषा सुन
विस्मित अधर मूक से रह जाए
जो तस्वीर बसी मन दर्पण में
कोई और नहीं तुम ही थे
------प्रियंका े

Thursday, 31 July 2014

दिन


दिन
कतरा कतरा पिघलता है
लम्हा लम्हा ढलता है दिन
बंद आंखों के चंद ख्वाब की तरह
रोज ही बनता बिगडता है दिन

किसी भटके मुसाफिर की तरह
रोज उन्हीं गलियारों से गुजरता है दिन

कभी सुस्त कदमों से
कभी वक्त से बहुत तेज
जाने कयूं कहां कहां भटकता है दिन

सुरमई सी सुबह धूप तेज दुपहरी की
या शर्मीली सांझ से
चंद लम्हे बटोरता है दिन

बेचैन सा फिरता है
चैन कहां हासिल उसको
तमाम बंद किताबों को
रोज खोलता पढता है दिन

सांझ गए
किनारे झील के खामोशी से
गम और खुशी के
तमाम पल फिर गिनता है दिन

हर पहर छुडा लेता है हाथ
बारी बारी से
फिर भी मुस्कुराता टहलता है दिन

यूं ही तो नहीं गुजर जाया करता
अपनों की तल्खियों से
थक कर जब टूटता है
तब डूबता है दिन............................

-----प्रियंका

Saturday, 19 July 2014

श्रम ताप हरो मन का आकर
सुख सुषमा के पावन दिनकर
अब क्लान्त जगत को श्रान्त करो
नव किरण बिखेरो रजनी हर

शुचि प्रेम सुधा पावन भर दो
झलके स्मित अधरों पर मर्मर
आतप्त करो जलते मन को
करुणामय हस्त वरद धर कर

अस्ताचल सूरज चंद्र उदित
हो स्तब्ध सांझ रजनी प्रमुदित
जीवन को अनगिन रूप दिए
पर अंत तुम्ही सबकुछ नश्वर

नक्षत्र यहां जलते झिलमिल
शशि निशि की भी पलकें तंद्रिल
बन सुखद स्वप्न मन में विचरो
संतृप्त करो शीतलता भर
-------प्रियंका