Tuesday, 22 April 2014

जागत- जागत ताकत-ताकत हेरत दीठि रही पथराई
सोच रहा मन पागल कातर होकर नाहक प्रीत लगाई
 जागत सोवन व्याकुल है तुम देख सको नहि पीर पराई
 आस धरे मन ताकत है पथ सोच रहा तेरी निठुराई

 पावक मोहक फूल खिले बगिया चहकी महकी अमराई
 गावत नाच रहीं सखियाँ मनमोहन मोहि बड़ी सुधि आई
 मोहक तान सुनी मुरली धुन की मन की कलिका हरषाई
 छेड़ रही सखियाँ सगरी मनमोहन प्राण सखी इतराई

जानत हो तुम केशव प्राण रहे तुमरे बिन ही अकुलाई
 साथ रहो तुम चाहत हूं बस मोहिं नहीं कछु देत सुझाई
 सांस बसे तुम प्रेमहिं बंधन काट सको मिल जाय रिहाई
 जाय सको मन मानस से तब मैं समझूं तुमरी प्रभुताई
                                                  -------- प्रियंका

Friday, 18 April 2014

मम्मा जगमग तारों की दुनिया में तुम कैसे मेरे बिन रहती होगी

मम्मा जगमग तारों की दुनिया में
तुम कैसे मेरे बिन रहती होगी
क्या याद मुझे तुम भी
हरपल एसे ही करती होगी

मम्मा सुबह सवेरे उठ जाता हूं
पर पास नहीं तुमको पाता हूं
आंखें मूंदे लेटा रहता हूं
तुमको ही सोचा करता हूं
पास अभी तुम आओगी
प्यार से मुझे जगाओगी

चुप से दूध भी पी लेता हूं
तंग जरा भी न करता हूं
होमवर्क भी बाकी न रहता
और खेलने को भी न लडता
मम्मा जब तुम वापस आओगी
मुझको अच्छा बच्चा पाओगी

हां मम्मा चुपके से सुनना
और किसी से भी न कहना
भूख नहीं बिलकुल भी होती
कौन खिलाए दौड के रोटी
पापा तो आफिस जाते हैं
हां अब जल्दी घर तो आ जाते हैं
दादी थोडा सा ही चलती हैं
पर अक्सर घुटने अपने मलती हैं

पापा से लोरी सुन लेता हूं
सोने का बस नाटक करता हूं
तुम जब मुझे सुलाती थीं ना
चूडी छन छन बजती थी ना
मम्मा सबकी जब मम्मी आती हैं
तेरी याद बहुत आती है

भगवान कभी जब मिलेंगे तुमसे
सब कह देना तब तुम उनसे
मेरी टॉफी और खिलौने ले लें
गुलल्क के सब सिक्के ले लें
भोग से पहले न लड्डू मागूंगा
उनकी मिठाई भी न देखूंगा

बहुत लडूंगा इक रोज मैं उनसे
क्यूं वो मेरी सुनते नहीं
क्यूं तुमको वो लेकर गए
क्या उनकी अपनी मम्मी नहीं

          --------प्रियंका

Monday, 14 April 2014

अब कोई कृष्ण न आएगा

भ्रम भय संशय व्याप्त हृदय में
छल कपट का साम्राज्य रचा
षडयंत्र द्वेष की दाहक अग्नि से
क्यों हुई आज संतप्त धरा
अट्टहास चहुं ओर गरजते
कौरव और दुर्योधन के
बदले से अब मापदंड हैं
मानवता और जीवन के
रणभूमि और कर्मभूमि में
न कोई उपदेश सुनाएगा
यह कलियुग का महासमर है
अब कोई कृष्ण न आएगा

दुर्योधन के पक्ष में बैठे
स्तम्भ यहां देखो सारे
दुःशासन का उत्साह बढाते
यह नीति रीति के सब मारे
बाध्य बने इन वीरों को
कैसे हम निर्दोष कहें
पूर्ण समर्पित शकुनि का
क्यों हम कोई दोष कहें
हर युग में एक युधिष्ठिर
पत्नी का दंव लगाएगा
यह कलियुग का महासमर है
अब कोई कृष्ण न आएगा


द्रौपदियां कितने रूपों में
अपमानित आज भी होती हैं
करती हैं करबद्घ निवेदन
रेखाओं पर भाग्य की रोती हैं
पूर्व हुई उन आहुतियों से
दीपशिखा बन जाना होगा
करनी होगी स्वयं की रक्षा
दुर्गा रूप दिखाना होगा
कापुरूषों की टोली से अब
न कोई लाज बचाएगा
यह कलियुग का महासमर है
अब कोई कृष्ण न आएगा
            ----प्रियंका