Thursday, 8 May 2014

सुन्दर दूरी साथ रहे

अभीप्सित नहीं स्नेह इतना
कि ताजमहल में कम्पन हो
साथ चलें हर पग पर हम
फिर भी सुन्दर दूरी साथ रहे


सुघर पारखी बन कर तुमने
ये जीवन कंचन कर डाला
सम्पूर्ण बने न जीवन मेरा
पारस की सदा ही आस रहे


नियति साथ चलती है सबके
भाग्य रचाए खेल अनेक
बाद दिवस की कड़ी धूप के
बस स्वप्निल संध्या साथ रहे

तुम मन मानस के देव बने
बस इतना सा वर दे देना
पूरी न हो आस सभी
अधूरी ही मन चाही साध रहे
                 ------
प्रियंका 

6 comments:

  1. नियति साथ चलती है सबके
    भाग्य रचाए खेल अनेक
    सत्य है। सुन्दर प्रस्तुति।

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  2. शिव ने शायद द्वितीया चंद्रा इसी लिए शीश पर धारण किूया है की प्रगती की निरंतरता बनी रहे. पारस की आस और मान की साध अधूरी रखने की कामना........ अद्भुत अद्भुत....

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  3. शिव ने शायद द्वितीया चंद्रा इसी लिए शीश पर धारण किूया है की प्रगती की निरंतरता बनी रहे. पारस की आस और मान की साध अधूरी रखने की कामना........ अद्भुत अद्भुत....

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (11-05-2014) को ''ये प्यार सा रिश्ता'' (चर्चा मंच 1609) पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

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  5. बहुत ही सुंदर रचना प्रियंका जी

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