Wednesday, 21 May 2014

सागर-----
तुम विशाल, निर्बंध, शान्त, गम्भीर
सदैव तुम्हारी सीमाहीन सत्ता में
अपनी लघुधारा अर्पण की है
परन्तु तुम्हारे निर्दय थपेडों से
हर बार आहत ही हुई हूं

कैसा ये हठ है जो हार नहीं मानता
एक नया संकल्प लिए
हर बार निकल पडता है
अंजुरी में मधुर संगीत और समर्पण लिए

तुम्हारा वैराट्य गम्भीरता शान्ति
छल जाती है हर बार

कभी शबरी की श्रद्धा
कभी सुजाता की पूजा बन
विसर्जित होना चाहती हूं
परन्तु अंजुरी का सम्पूर्ण प्रसाद
आहत और चूर चूर हो जाता है
 बेपरवाह लहरों से टकराकर

समझ ही नहीं पाती
अपने व्यक्तित्व की सम्पूर्ण मिठास
तुम्हें अर्पण कर के भी
क्यों दूर नहीं कर पाती तुम्हारा खारापन
क्यों नहीं बना पाती मीठी
तुम्हारी एक भी बूंद..................
                    -------प्रियंका



4 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (01-06-2014) को ''प्रखर और मुखर अभिव्यक्ति'' (चर्चा मंच 1630) पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सुन्दर रचना प्रियंका जी, इसे अन्यत्र भी पढ़ा, जब पढ़ा अच्छी लगी.. बहुत बधाई आपको..

    ReplyDelete
  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  4. भावपूर्ण अभिव्यक्ति है ...

    ReplyDelete